brajknowledge.blogspot.com

Sunday, 19 July 2020

ब्रज~छन्द (धाम गोवर्धन)

ब्रज की रज से निकले कुछ छन्द आपके सम्मुख प्रस्तुत है~


गोवर्धन पूजन चले री गोपाल।
मत्त गयन्द देख जिय लज्जित निरख मंद गति चाल।।
ब्रजनारी पकवान बहुत कर भर - भर लीने थाल।
अंग सुधंग पहर पट भूषण गावत गीत रसाल।।
बाजे अनेक वेणु रव सौ मिलि, चलत विविध सुरताल
ध्वजा पताका छत्र चमर धर करत कुलाहल ग्वाल।
बालक वृन्द चहूँदिसि सोहत, मानों कमल अलिमाल
कुम्भनदास प्रभु त्रिभुवन मोहन गोवर्धन लाल।
                           ★★★

मानस मन धोयवे कूँ मध्य मानसी जू गंग।
ताके पय पान ते पीयूष रस फीको है।।
सृष्टि के अभीष्ट फल दैवें कूँ तैसो तहाँ।
इष्ट गिर्राज सब देवन कौ टीको है।।
राजै गिरी कन्दरा विराजै जहाँ श्यामा श्याम।
गोवर्धन धाम परम् धाम हूँ सौ नीको है।।
                       ★★★
करत सब गोवर्धन की पूजा।
गिरि रचि ठौर जलेबी लाडू बीच लगावत गूँजा।।
अचरज सिंधु नहावत लखि सुख रति लक्ष्मी गिरिजा।
ललित लड़ैती कहहि व्रजतिय सम भाग नही काहू दूजा।।
                           ★★★
                                        ~दीपक लवानियां

No comments:

Post a Comment