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Wednesday, 29 July 2020

श्री ब्रजेश्वर महादेव

श्री ब्रजेश्वर महादेव ~

भानोखर के निकट श्री ब्रजेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। श्री वृषभानु महाराज एवं समस्त गांव वासियों ने ब्रज के मंगल हेतु श्री ब्रजेश्वर महादेव को प्रतिष्ठित किया। एक जनश्रुति है कि - एक समय कुछ ब्रजवासी  श्री ब्रजेश्वर महादेव को स्थान्तरित करने की चेष्टा करने लगे। इस पर श्री महादेव की महिमा से उन्होंने एक विशाल शिव रूप दर्शन कर भयभीत हो क्षमा प्रार्थना करने लगे। आज भी श्री ब्रजेश्वर महादेव वही पर स्थित है।
 
ब्रजेश्वराय ते तुभ्यं महारुद्राय ते नमः।
व्रजौकसां शिवर्थार्थ नमस्ते शिवरूपिणे।।
        
                                              ~ दीपक लवानियां

                               ★★★

                

Thursday, 23 July 2020

JATIPURA (GOVERDHAN)

जतीपुरा गांव - दर्शन ~
     गोवर्धन के दक्षिण - पश्चिम दिशा में जतीपुरा गांव स्थित है। श्री पाद माधवेंद्र पुरी गोस्वामी द्वारा श्री नाथ जी के प्रकटोपरांत श्री गिर्राज पर्वत पर स्थापित करते है। अतः चर्ब, चोष्य, लेह्य, पेय युक्त नाना प्रकार के भोग्य द्रव्यों द्वारा अन्नकूट महोत्सव का आयोजन करते है। श्री नाथ जी के भोजन ग्रहण करते समय उनके दिव्य शरीर से एक आलौकिक ज्योति प्रकट होती है। इसी आधार पर इस स्थान का नाम जतीपुरा पड़ा। अन्नकूट महोत्सव की तिथि कार्तिक मास के शुक्लपक्ष में प्रतिपदा तिथि थी। आज भी इस तिथि को उसी लीलानुसार प्रति वर्ष एक विशाल अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है।
इस स्थान पर विशेष दर्शनीय स्तल श्री मुखारबिंद जहा अन्नकूट महोत्सव का आयोजन किया जाता है। इसे गोवर्धन पर्वत का मुख भी माना गया है। इस स्थान के निकट ही श्री पाद बल्लभाचार्य की बैठक है।, श्री मदनमोहन मन्दिर, श्री नवनीत प्रिया जी का मंदिर, श्री मथुरेश जी का मंदिर, श्री वासुदेव दत्त, श्री सारँगमुरारी, श्री वृन्दावन दास ठाकुर व पूज्य माँ नारायणी देवी के चरण चिन्ह दर्शनीय है। श्री गोपाल जी के नाम पर इस स्थान का प्राचीन नाम गोपालपुरा गांव था।

                                              ~दीपक लवानियां

Wednesday, 22 July 2020

पूँछरी का लौठा (पूँछरी गांव)

पूँछरी का लौठा~

आन्यौर गांव से 3 km दक्षिण दिशा में पूँछरी गांव स्थित है। पूँछरी नाम का प्रथम कारण - श्री गिर्राज जी की आकृति मयुराक्रति है। राधाकुंड एवं श्यामकुण्ड उनके दो आंख एवं यह भाग मोर की पूंछ की तरह होने के कारण पूँछरी पड़ा। दूसरा कारण - श्री गिर्राज जी की आकृति गौ रूप है। इस आकृति में राधाकुंड में गिरराज जी जिव्हा गोपकुआ में से प्रकट हो कर राधाकुंड श्री गोविन्द मंदिर में विराजित है तथा मुकुट गोवर्धन में है और पूँछ पूँछरी में है। इस कारण इस गांव का नाम पूँछरी पड़ा। परिक्रमा मार्ग पर गांव में श्री कृष्ण - बलराम मंदिर विराजित है। गांव के पश्चिम भाग में श्री लौठा जी का मंदिर दर्शनीय है। 


श्री लौठा जी संबंधित एक कथा - श्री लौठा जी नाम के श्री कृष्ण के एक मित्र थे। द्वारका गमन समय श्री कृष्ण ने लौठा जी को अपने साथ चलने का अनुरोध किया। इसपर लौठा जी बोले - है प्रिय सखा ! मेरी ब्रज त्यागने की कोई इच्छा नही है। परंतु तुम्हारे ब्रज त्यागने का मुझे अत्यंत दुख है।  अतः तुम्हारे पुनः ब्रजगमन न होने तक मे अन्न जल इत्यादि परित्याग कर भजनविस्ट हुए। तभी से पूँछरी स्थित जिस स्थान पर बैठ श्री लौठा जी भजनाविस्ट हुए थे वह स्थान पूँछरी के लौठा के नाम से प्रसिद्ध है। श्री लौठा जी मन्दिर के पास अप्सराकुण्ड  एवं नावलकुण्ड स्थित है। देवराज इंद्र ने जब श्री कृष्ण का अभिषेक किया तब स्वर्ग से अप्सराएं आगमन कर इस स्थान पर नृत्य किया । इस कारण इस कुंड का नाम अपसरा कुंड हुआ। इस कुंड में स्नान करने से अप्सरा सम देह प्राप्त होती है। इसके पास नवलकुण्ड स्थित है। इस कुण्ड का प्राचीन नाम पूँछकुण्ड था। भरतपुर राजा की महारानी का नाम  नवलरानी था । उन्होंने अप्सराकुण्ड एवं नवलकुण्ड का पक्का निर्माण कराया था। उन्ही के नाम पर इसका नाम नवलकुण्ड हो गया। इस कुण्ड का जलपान करने से श्री कृष्ण चरणामृत पान लाभ एवं स्नान से मुक्ति पद लाभ होता है। कुंड के पूर्व तट पर नरसिंह देव जी का मंदिर है । अप्सराकुण्ड के पश्चिम तट पर श्री अप्सरा बिहारी जी का मंदिर आदि दर्शनीय है।

                                            ~दीपक लवानियां

गोविन्द कुण्ड (आन्यौर)

गोविन्द कुण्ड दर्शन ~

आन्यौर गांव के दक्षिण दिशा में श्री गिर्राज जी तट पर गोविन्द कुण्ड स्थित है। इस स्थान पर देवराज इंद्र ने अपने अपराध क्षमा कराने के लिए प्रार्थना की थी। उस समय उसने सुरभि गाय के दूध एवं विभिन्न तीर्थों के जल से भगवान श्री कृष्ण का अभिषेक किया। इंद्र ने भगवान कृष्ण को 'हे गोविंद' नाम से सम्बोधित कर  प्रार्थना की थी, अभिषेक का जल जो इकठ्ठा हुआ है उसीका नाम गोविंद कुण्ड है। कुंड के पूर्व में श्री गोविन्द मन्दिर, उत्तर दिशा में श्री नाथ जी का मंदिर, एवं श्री माधव बाबा का आश्रम, पश्चिम दिशा में श्री गिरराज पर्वत , दक्षिण दिशा में श्री मदन मोहन मन्दिर एवं श्री मनोहर दास बाबा का आश्रम दर्शनीय है।

                                              ~दीपक लवानियां

Sri Danghati Darshan (Goverdhan)

दानघाटी दर्शन~

गोवर्द्धन के मध्य में, श्री गिर्राज पर्वत के ऊपर मैन रोड के दक्षिण भाग पर दानघाटी मंदिर स्थित है। इस स्थान पर श्री पूर्णमासी देवी की सहायता से श्री कृष्ण ने श्री राधा जी से सखियो सहित दान लिया था। तथा श्री राधा और सखियों से हास्य विनोद किया था। इस लीला के कारण इस स्थान का नाम दानघाटी हुआ। 'श्री दानकेलि कौमुदि' ग्रथ से संक्षिप्त विवरण - एक समय श्री इन्द्रध्वज स्थान पर (श्री गोविन्द कुंड के निकट) एक यज्ञ का आयोजन किया गया था। इस यज्ञ का नियम था। कि जो भी इस यज्ञ में घृत, मधु आदि दान करेंगे उनका धन सम्पद एवम मनोकामना पूर्ण होगी।

 ललितादि सखियां विविध मणि मुक्ताओ से गठित अलंकारो द्वारा श्री राधारानी को विभूषित कर घृत, मधु भरे कलश लिए यज्ञ स्थल को रवाना हुए। श्री कृष्ण ने सुबल मधुमंगलादि सखाओं संग दान लीला हेतू इस स्थान पर बैठ श्री राधरानी एवं सखियों की प्रतीक्षा करने लगे। सखियां जब इस मार्ग से निकलने लगी तो श्री कृष्ण ने कहा - 'हे सखियों ! इस पथ से गुजरने वाले को दान प्रदान करना पड़ता है। अतः हमें दान प्रदान करो।' सखियाँ बोली  - 'हम व्रत धारण कर घृतादि लिए यज्ञ को जा रही है। अतः हमें मार्ग दो।' श्री कृष्ण बोले - 'सर्वप्रथम हमे दानस्वरूप श्री राधारानी के गले का मणि युक्त हार एवं यज्ञ का द्रव्यादि प्रदान करो, इस प्रकार वार्तालाप चलता रहा। अतः दानलीला छल से श्री राधा-कृष्ण का युगल मिलन हुआ। यही दान लीला का प्रसंग है।
     
                                             ~दीपक लवानियां

Monday, 20 July 2020

चक्रतीर्थ/चकलेश्वर महादेव (गोवर्धन)

चक्रतीर्थ/चकलेश्वर महादेव~
चक्रतीर्थ का वर्तमान नाम चकलेश्वर है। यह गोवर्धनस्थ: मानसी गंगा के उत्तर तट पर स्थित है।इस स्थान पर चकलेश्वर महादेव, श्री मनमहाप्रभु जी का मंदिर एवं श्री पाद सनातनदास गोस्वामी की भजन कुटीर है। भगवान श्री कृष्ण ने जब श्री गिरी गोवर्द्धन को धारण किया था तो उनके आदेशानुसार सुदर्शन चक्र, इंद्र द्वारा प्रवाहित वर्षा जल को अपनी ओर आकर्षित कर शोषण करने लगा। सात दिनों तक भीषण वर्षा उपरांत भी जब ब्रजवासियों को किसी प्रकार ख्यति न कर पाए तो देवराज इंद्र वर्षा बन्द कर श्री कृष्ण से क्षमा प्रार्थना करने लगे। वर्षा समाप्त होने पर इस स्थान पर सुदर्शन चक्र आकार श्री कृष्ण (श्री नारायण) के हस्त में स्थित हुआ। इस कारण इस स्थान का नाम चक्रेस्वर पड़ा।प्राचीन काल मे इस स्थान पर श्री महादेव जी का मंदिर दर्शनीय था। एवं सुदर्शन चक्र श्री नारायण के हस्त पुनः स्थित हुआ इन दोनों कारणों से इस स्थान का नाम चकलेश्वर महादेव हुआ।

श्री कृष्ण द्वारा चक्रतीर्थ में श्री पाद सनातन दास गोस्वामी पर कृपा~

श्री पाद सनातन गोस्वामी जब इस स्थान (चकलेश्वर) पर वास करते थे। तो अपनी वर्द्धवस्था के कारण श्री गिर्राज जी की परिक्रमा करने में असमर्थ थे। एक दिन भगवान श्री कृष्ण एक बालक का रूप धारण कर उनके निकट आ बोले~ "हे बाबा! तुम अति वृद्ध हो इस कारण श्री गिर्राज परिक्रमा करने में असमर्थ हो अतः मैं गिर्राज पर्वत से एक श्री कृष्ण के चरण चिन्ह युक्त श्री गिर्राज शिला खण्ड लाया हूं। तुम इसकी परिक्रमा करो। इससे तुम्हारी श्री गिर्राज परिक्रमा पूर्ण होगी"। यह बोलकर बालक शिला खण्ड दे कर अन्तरध्यान हो गए। अतः  गोस्वामी जी उस बालक को न देख, बालक रूपी श्री कृष्ण के छल को समझ गए। तभी से वे नित्य उस श्री गिर्राज शिला खण्ड की परिक्रमा करने लगे । वर्तमान में यह शिला खण्ड व्रन्दावन स्थित श्री राधादामोदर मन्दिर में दर्शनीय है।
                                            ~दीपक लवानियां

आपको ब्रज के किसी भी स्थान की जानकारी प्राप्त करने के लिए comment में बताइये।

Sunday, 19 July 2020

उठिये ब्रह्मर्षि

★उठिये ब्रह्मर्षि★
गुरु विस्वामित्र एवं गुरु वशिष्ठ~

विश्वामित्र, वशिष्ठ से ईर्ष्या करते थे। वे ब्रह्मर्षि होना चाहते थे। उन्होंने हरिशचन्द्र को भिखारी बना दिया।
वशिष्ठ की गौ नंदिनी का बलात अपहरण करना चाहा। वशिष्ठ पर आक्रमण किया, मगर वशिष्ठ के ब्रह्मदण्ड से छूकर विस्वामित्र की सभी दिव्यास्त्र नष्ट हो गए। उन्होंने गायत्री मंत्र की रचना कर, वर्षों कठोर तप किया। ब्रह्मा ने उन्हें समझाया स्पर्धा, हीनभाव ग्रस्त प्राणी का लक्षण है। दूसरो को नीचा दिखाने के लिए किया श्रम अनन्तः अकारथ जाता है। अगर वशिष्ठ ही आपको ब्रह्मर्षि मान ले। तभी आप ब्रह्मर्षि हो सकेंगे, वरना आप राजर्षि ही रहेंगे। यह सुनकर विस्वामित्र की इर्ष्याग्नि और भड़क गई। उन्होंने वशिष्ठ के सौ पुत्रों का वध करवा दिया।और स्वयं वशिष्ठ को मार डालने के लिए उनके आश्रम में आ छिपे।

चांदनी रात थी। वशिष्ठ अपनी अरुंधती के साथ बाहर बैठे थे। "कैसी निर्मल ज्योत्स्ना है!" अरुंधती ने कहा। वशिष्ठ बोले,  हाँ, बिल्कुल विस्वामित्र के तप जैसी निर्मल।' विस्वामित्र छिपे खड़े थे। उन्होंने जब वषिष्ठ के ये वाक्य सुनें तो उनका ह्रदय धिक्कार उठा, 'एकांत में बैठा, जो अपने सौ पुत्रों के हत्यारे की प्रशंसा कर रहा है, उस महापुरुष को मारने आया है तू ?' विस्वामित्र तत्काल सामने आकर वशिष्ठ के पैरों पर गिर पड़े। वशिष्ठ ने झुककर उठाते हुए कहा, 'उठिये ब्रह्मर्षि'।
                                       ~दीपक लवानियां

ब्रज~छन्द (धाम गोवर्धन)

ब्रज की रज से निकले कुछ छन्द आपके सम्मुख प्रस्तुत है~


गोवर्धन पूजन चले री गोपाल।
मत्त गयन्द देख जिय लज्जित निरख मंद गति चाल।।
ब्रजनारी पकवान बहुत कर भर - भर लीने थाल।
अंग सुधंग पहर पट भूषण गावत गीत रसाल।।
बाजे अनेक वेणु रव सौ मिलि, चलत विविध सुरताल
ध्वजा पताका छत्र चमर धर करत कुलाहल ग्वाल।
बालक वृन्द चहूँदिसि सोहत, मानों कमल अलिमाल
कुम्भनदास प्रभु त्रिभुवन मोहन गोवर्धन लाल।
                           ★★★

मानस मन धोयवे कूँ मध्य मानसी जू गंग।
ताके पय पान ते पीयूष रस फीको है।।
सृष्टि के अभीष्ट फल दैवें कूँ तैसो तहाँ।
इष्ट गिर्राज सब देवन कौ टीको है।।
राजै गिरी कन्दरा विराजै जहाँ श्यामा श्याम।
गोवर्धन धाम परम् धाम हूँ सौ नीको है।।
                       ★★★
करत सब गोवर्धन की पूजा।
गिरि रचि ठौर जलेबी लाडू बीच लगावत गूँजा।।
अचरज सिंधु नहावत लखि सुख रति लक्ष्मी गिरिजा।
ललित लड़ैती कहहि व्रजतिय सम भाग नही काहू दूजा।।
                           ★★★
                                        ~दीपक लवानियां

Saturday, 18 July 2020

Kusum Sarovar Darshan

कुसुम सरोवर दर्शन~

 
एक दिन श्री प्रियतम श्री प्रिया जी के श्रृंगार की उत्कंठा हुई। श्री भगवान अपने भक्तजनो को श्याम सुधा और राधारस माधुरी का आस्वादन कराने के लिए अद्भुत संकल्प करते है। श्री प्रिया जी का श्रृंगार करने के लिए प्रियतम श्यामसुंदर ने पुष्पचयन किया और श्रृंगार करने को निकुंज द्वार पर पधारे। परंतु प्रिया जी मन मान कर बैठी है। और तैयार नही होती है। बड़ी मनौती करने पर प्रिया जी ने कहा कि इन पुष्पों को धोकर स्वच्छ बनाकर लाओ तभी में इन्हें श्रृंगार के लिए स्वीकार करूँगी। प्रिया जी की इस भावना को अपने ध्यानपटल पर जब श्यामसुंदर ने देखा तो भाव विभोर हो गए। प्रिया जी भी श्रृंग़ार के बहाने इस ब्रज की धरती पर और एक दिव्य तीर्थ प्रकट करना चाहती है। प्रिया जी के इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए श्यामसुंदर ने बंशी के सहारे एक गर्त बनाया और अपनी अकारण करुणार्द्र रसधारा से उन समस्त पुष्प गुच्छों का प्रक्षालन किया। अनन्तर अविशिष्ट जल उस गर्त में संग्रहित होकर कुसुम सरोवर नाम से दिव्य तीर्थ के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।

                                      ~दीपक लवानियां

Shri Mansi Ganga (Goverdhan)

★मानसी गंगा★

गंगे दुग्धमये देवि भगवनमानसोदभवै:।
नम: कैवल्यरूपाढयै मुक्तिदै भुक्तिभागिनी।।
इति मंत्रं शतावृतयामज्जनाचमनैर्नमन ।
ब्रह्महत्यादि पापानि नश्यन्ति नात्र संशय।।
वृषहत्याप्रधातु विमक्तो देवकीसुत:।।

 
गिरराज गोवर्धन के हृदय पटल पर स्थित मानसी गंगा ब्रज भूूमि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल माना जाता है प्रत्येक वर्ष लाखों की संख्या में तीर्थयात्री इस पवित्र सरोवर में आचमन एवं स्नान के लिए आते है। गिर्राज जी की परिक्रमा तब तक पूर्ण नही मानी जाती जब तक मानसी गंगा के पवित्र जल का आचमन तथा स्न्नान न कर लिया जाए । ब्रज में इस सरोवर का महत्व गंगा के समान ही है । मानसी गंगा के बारे में यह लोक विख्यात है कि यह सरोवर किसी व्यक्ति के द्वारा निर्मित नही किया गया बल्कि भगवान श्री कृष्ण ने अपने मन की कल्पना मात्र से ही उत्पन्न किया है।


गोपिका वचनेनापि कृष्णस्तु मनसाकरोत।
वृषहत्या पराधस्य मुक्तये मानसी शुभम।।

ब्रजगोपियो के वचनों के अनुरूप श्री कृष्ण ने वृषभासुर रूप (गौ) की हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए अपने मानस से उत्पन्न किया। क्योंकि चरणोदक गंगा में स्नान करके भगवान कैसे पापमुक्त हो सकते थे । इसलिए इसे अपने मानस से प्रकट कर स्वयं स्नान किया। अतः इसे पाप विनाशिनी कहते है । कहा जाता है जो व्यक्ति इसमे स्नान करता है वह समस्त पापमुक्त होकर गोलोक धाम को प्राप्त करता है। 

                                         ~दीपक लवानियां