गोवर्द्धन के मध्य में, श्री गिर्राज पर्वत के ऊपर मैन रोड के दक्षिण भाग पर दानघाटी मंदिर स्थित है। इस स्थान पर श्री पूर्णमासी देवी की सहायता से श्री कृष्ण ने श्री राधा जी से सखियो सहित दान लिया था। तथा श्री राधा और सखियों से हास्य विनोद किया था। इस लीला के कारण इस स्थान का नाम दानघाटी हुआ। 'श्री दानकेलि कौमुदि' ग्रथ से संक्षिप्त विवरण - एक समय श्री इन्द्रध्वज स्थान पर (श्री गोविन्द कुंड के निकट) एक यज्ञ का आयोजन किया गया था। इस यज्ञ का नियम था। कि जो भी इस यज्ञ में घृत, मधु आदि दान करेंगे उनका धन सम्पद एवम मनोकामना पूर्ण होगी।
ललितादि सखियां विविध मणि मुक्ताओ से गठित अलंकारो द्वारा श्री राधारानी को विभूषित कर घृत, मधु भरे कलश लिए यज्ञ स्थल को रवाना हुए। श्री कृष्ण ने सुबल मधुमंगलादि सखाओं संग दान लीला हेतू इस स्थान पर बैठ श्री राधरानी एवं सखियों की प्रतीक्षा करने लगे। सखियां जब इस मार्ग से निकलने लगी तो श्री कृष्ण ने कहा - 'हे सखियों ! इस पथ से गुजरने वाले को दान प्रदान करना पड़ता है। अतः हमें दान प्रदान करो।' सखियाँ बोली - 'हम व्रत धारण कर घृतादि लिए यज्ञ को जा रही है। अतः हमें मार्ग दो।' श्री कृष्ण बोले - 'सर्वप्रथम हमे दानस्वरूप श्री राधारानी के गले का मणि युक्त हार एवं यज्ञ का द्रव्यादि प्रदान करो, इस प्रकार वार्तालाप चलता रहा। अतः दानलीला छल से श्री राधा-कृष्ण का युगल मिलन हुआ। यही दान लीला का प्रसंग है।
~दीपक लवानियां
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