★उठिये ब्रह्मर्षि★
गुरु विस्वामित्र एवं गुरु वशिष्ठ~विश्वामित्र, वशिष्ठ से ईर्ष्या करते थे। वे ब्रह्मर्षि होना चाहते थे। उन्होंने हरिशचन्द्र को भिखारी बना दिया।
वशिष्ठ की गौ नंदिनी का बलात अपहरण करना चाहा। वशिष्ठ पर आक्रमण किया, मगर वशिष्ठ के ब्रह्मदण्ड से छूकर विस्वामित्र की सभी दिव्यास्त्र नष्ट हो गए। उन्होंने गायत्री मंत्र की रचना कर, वर्षों कठोर तप किया। ब्रह्मा ने उन्हें समझाया स्पर्धा, हीनभाव ग्रस्त प्राणी का लक्षण है। दूसरो को नीचा दिखाने के लिए किया श्रम अनन्तः अकारथ जाता है। अगर वशिष्ठ ही आपको ब्रह्मर्षि मान ले। तभी आप ब्रह्मर्षि हो सकेंगे, वरना आप राजर्षि ही रहेंगे। यह सुनकर विस्वामित्र की इर्ष्याग्नि और भड़क गई। उन्होंने वशिष्ठ के सौ पुत्रों का वध करवा दिया।और स्वयं वशिष्ठ को मार डालने के लिए उनके आश्रम में आ छिपे।
चांदनी रात थी। वशिष्ठ अपनी अरुंधती के साथ बाहर बैठे थे। "कैसी निर्मल ज्योत्स्ना है!" अरुंधती ने कहा। वशिष्ठ बोले, हाँ, बिल्कुल विस्वामित्र के तप जैसी निर्मल।' विस्वामित्र छिपे खड़े थे। उन्होंने जब वषिष्ठ के ये वाक्य सुनें तो उनका ह्रदय धिक्कार उठा, 'एकांत में बैठा, जो अपने सौ पुत्रों के हत्यारे की प्रशंसा कर रहा है, उस महापुरुष को मारने आया है तू ?' विस्वामित्र तत्काल सामने आकर वशिष्ठ के पैरों पर गिर पड़े। वशिष्ठ ने झुककर उठाते हुए कहा, 'उठिये ब्रह्मर्षि'।
~दीपक लवानियां
No comments:
Post a Comment